कही अनकही – लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)

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(Bidholi, Dehradun)

*) – अस्तित्व की लड़ाई

यह बात मेरे मन में लंबे समय से थी और आज लिखने का मौका मिल पाया है। बताते है ब्रिटिश साम्राज्य में कभी सूरज नहीं ढलता था, दुनिया भर के इतने देश जो उनके गुलाम थे। उनसे पहले जगह-जगह मुसलमान शासक रहे जिन्होंने भारत के एक बड़े हिस्से समेत अनेको प्रांतो, देशो में अपना राज्य स्थापित किया। अलग-अलग राज्यों की अपनी संस्कृतियों, तौर तरीको में हमेशा आक्रमण कर जीतने का तरीका नहीं चलता था और अगर चलता भी था तो बाहरी आक्रमणकारियों से जनता में असंतोष, असहयोग की भावना रहती जिस कारणवश ऐसे शासकों के पाँव थोड़े समय बाद उस धरती से उखड जाते। इस समस्या से पार पाने की जो योजना विदेशियों ने सदियों पहले सोची उसपर भारतवासियों ने आजतक अमल नहीं किया। हमारी प्रवृति में कहीं आक्रमण करना नहीं है। पर आजकल तुलनात्मक बातों में भारत, सनातन धर्म और लोगो के बारे में कई अफवाहें फैली हुई है जिस वजह से कई लोग हम लोगो से, हमारे धर्म से डरते है या हेय दृष्टि से देखते है। परिणामस्वरूप हर किसी को जैसे हमारी बेइज़्ज़ती करने का या मज़ाक उड़ाने का लाइसेंस मिला हुआ है।

अनजान भारी-भरकम शब्दों, बातों और उदाहरणों से हर कोई पीछे हटता है। तो छूटते ही अपने ग्रंथो, श्लोक, दंतकथाओं आदि के उदाहरण ना दें। कहीं भी अपने पाँव ज़माने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है उस जगह की संस्कृति, लोगो, भाषाओ आदि स्थानीय बातों की समझ बनाकर वहां जनता से संवाद बनाना, मैत्रीपूर्ण बंधन बनाना और फिर धीरे-धीरे अपनी संस्कृति, बातों से उन्हें अवगत कराते हुए उस संस्कृति का हिस्सा बनाना। परिस्थितियाँ अब आधी शताब्दी पहले जैसी नहीं है पर हमारे अस्तित्व की लड़ाई अब भी है। श्री श्री रविशंकर, बाबा रामदेव ने अपने तरीको से अच्छा प्रचार किया है (हालाँकि, देसी-विदेशी मीडिया उनका उपहास उड़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ता।) कोशिश यह होनी चाहिए कि हम बाहरी सकारात्मक बातों को अपनी संस्कृति में समाहित करें और अपनी संस्कृति की अनेको अच्छी बातों का समावेश विदेशों के तौर-तरीकों में करवायें। तो इंग्लिश या अन्य भाषाओँ, पहलुओं से भागें नहीं बल्कि उन्हें सीखें ताकि आगे चलकर आप अपने पहलु दूसरो को सिखा पायें क्योकि प्रकृति का नियम है – बड़ी मछली छोटी मछलियों को आहार बनाती है, इस समय धाराएँ प्रतिकूल है और कुछ बड़ी मछलियाँ छोटी-छोटी संस्कृतियों को निगल भी रही है, एक-आध सदी बाद यह नौबत हमपर ना आये तो सचेत हों जायें।
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*) – बातों-बातों में आप सुनते होंगे कि “मैं तो 50-55 तक जी लूँ एक्टिव लाइफ, क्योकि मुझे बुढ़ापे का दर्द नहीं झेलना।” उम्र के उस पड़ाव की काफी अहमियत है जिसको हम नज़रअंदाज़ कर देते है। सबसे पहले तो बूढ़े व्यक्ति एक सिंबल की तरह होते है, जिनका जीवन स्वयं में अनेको शिक्षाएं लिए होता है। जीवन के कई अनुभवों से वो परिवार के सक्रीय सदस्यों को सीख देते रहते है। साथ ही उनके रहते हुए आम तौर पर संतानो में शान्ति रहती है 12-15 साल। इस शान्ति का एक प्रमुख कारण संपत्ति होती है। ऐसी कुछ और बातें है पर वह बताने से पहले यहाँ मैं आप लोगो के इस विषय पर विचार जानना चाहूंगा।

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*) – ऐसे निष्कर्षों पर ना कूदें….

बहुत से प्रयोग करने के बाद एक रचनाकार, फिल्मकार उस स्तर पर पहुँचता है जहाँ रचना गढ़ते (बनाते) समय उसके लिए उस रचना में प्रयुक्त जगहों, बातों, किरदारों का वर्गीकरण मायने नहीं रखता। उदाहरण स्वरुप अनुराग कश्यप को कुछ जगह नारी विरोधी बताया जाता है क्योकि उनकी फिल्मो में नेगेटिव किरदारों में महिलायें आती रहती है। पर यह नोट करने वाले समीक्षक, आलोचक और प्रशंषक भूल जाते कि उन्होंने अब तक उन किरदारों से कई गुना अधिक वैसे नकारात्मक गुणों वाले रोल्स में पुरुषों को कास्ट किया है। इतना सब काम करने के बाद वो किसी वर्ग के दोस्त अथवा दुश्मन नहीं होते बल्कि अपनी कहानी अनुसार किरदारों के दोस्त या दुश्मन बन जाते है। यथार्थवादी और प्रतिभावान व्यक्तियों के प्रयासों पर इतनी जल्दी ऐसे निष्कर्षों पर आना ना सिर्फ उनकी मेहनत का उपहास उड़ाना होगा बल्कि उन्हें बेवजह बदनाम करना भी होगा। अगर आपको एक ढर्रे पर चलने की आदत है और कोई उसपर नहीं चल रहा इसका मतलब यह नहीं की उसमे कोई कमी है।

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